ज़िंदगी एक काग़ज़ की कश्ती है
इच्छाएँ लेहरों की तरह बहती हैं
कभी शांत कभी पुश्त
मनुष्य को अपनी बाहों मे समेट कर
किनारे से किनारे
लेहरें टकराती है और वापस चली जाती है
शुरुआत मे आराम
किनारा अब दूर नही
बेहते बेहते.. लेहरों की जकड़े
आदमी को लपेट लेती है
पहुँचते पहुँचते आदमी बिखर जाता है
कश्ती टूट जाती है
बचे हुए टुकड़ों को भी
लेहरें पी जाती हैं
यह एक अनूठी सी कहानी लगती है
पर हर आदमी इस सफ़र पर जाता है
और चिथड़े चिथड़े होकर बह जाता है
वापसी का नाम नही
चले तो बस चले
यही है ज़िंदगी का सफ़र
First post in hindi.. Pardon the rendering folks.... This is the best quillpad could do for me :)
Monday, July 02, 2007
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1 comment:
bolne ko asan lafj safar hai
kahe ko bejan lafj safar hai
"zindagi ka safar "
karthikji ne
har kisi ke zindagi ke safar ka hai atyant nirmal varnan
shabdon ko pirokar ek sundar ladi mein , into shat shat naman :)
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